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आसक्ति रहित दान का पुण्य कितना है? चीनी अनुवादित वज्रसूत्र की व्याख्या पाँचवाँ पाठ Dorjey Chöpa
पाठ की अवधि: 15:19
वज्रच्छेदिका प्रज्ञापारमिता सूत्र (वज्र सूत्र) - अध्याय 4: अनासक्त श्रेष्ठ आचरण 📍 स्थान: लारुंग गर बौद्ध अकादमी 🎤 व्याख्याता: खेनपो सोदरग्ये ⏱️ समय चिह्न / विवरण इस व्याख्यान में, खेनपो सोदरग्ये 'वज्रच्छेदिका प्रज्ञापारमिता सूत्र' (वज्र सूत्र) के चौथे अध्याय 'अनासक्त श्रेष्ठ आचरण' की गहन व्याख्या करते हैं। इस सत्र का मुख्य केंद्र 'अनासक्त दान' या है। भगवान बुद्ध सुभूति को समझाते हैं कि एक बोधिसत्व को दान करते समय रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श और धर्म जैसे बाहरी विषयों के प्रति किसी भी प्रकार की आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। इसे 'त्रिमंडल-शून्य' दान कहा गया है, जहाँ दाता, प्राप्तकर्ता और दान की वस्तु, तीनों को स्वभाव से शून्य माना जाता है। व्याख्यान के दूसरे भाग में, बुद्ध काय लक्षणों (Body Marks) की शून्यता पर प्रकाश डालते हैं। खेनपो जी स्पष्ट करते हैं कि तथागत के बत्तीस महापुरुष लक्षणों को उनका वास्तविक स्वरूप नहीं माना जा सकता, क्योंकि 'जितने भी लक्षण हैं, वे सभी मिथ्या हैं।' जब कोई साधक सभी लक्षणों को अलक्षण (Non-sign) के रूप में देखता है, तभी वह वास्तव में तथागत के सत्य स्वभाव या धर्मकाय का दर्शन कर पाता है। यह प्रवचन हमें आसक्ति को वश में करने और प्रज्ञा के आधार पर श्रद्धा विकसित करने की प्रेरणा देता है। 🤖 AI सामग्री सूचना AI हिन्दी अनुवाद एवं लिप-सिंक AI द्वारा निर्मित हैं। व्याख्यान की विषयवस्तु एवं फ़िल्मांकन स्थल पूर्णतः प्रामाणिक हैं। AI 🏷️ Tags 📚 उद्धृत ग्रंथ / वज्रच्छेदिका प्रज्ञापारमिता सूत्र / वज्र सूत्र / रत्नावली / (Nagarjuna) मध्यमकावतार / (Chandrakirti) चतुःशतक / (Aryadeva) तथागतगर्भ सूत्र / 🔔 सब्सक्राइब करें / 👍 लाइक और शेयर करें / 💬 अपने सवाल कमेंट करें /

Khenpo Sodargye
प्रशिक्षक
स्तर
चुनौतीपूर्ण
CMS स्तर कोड: advanced
विस्तार
5 पाठ · 1 घंटे 1 मि
प्रकाशित
1 सित॰ 2026
रेटिंग
4.8 / 5 (5 में से)