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क्या केवल तर्क से बौद्ध धर्म को समझा जा सकता है? National University of Singapore Q&A
पाठ की अवधि: 12:23
बौद्ध धर्म और आस्था — प्रश्नोत्तर सत्र: भौतिकी, प्रज्ञा और आधुनिक युग में साधना 📍 स्थान: सिंगापुर का राष्ट्रीय विश्वविद्यालय 🎤 व्याख्याता: खेनपो सोदरग्ये 🗓️ तिथि: 19 जुलाई 2016 ⏱️ समय चिह्न / विवरण सिंगापुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में मुख्य प्रवचन के उपरांत आयोजित इस प्रश्नोत्तर सत्र में पूज्य खेनपो सोदरग्ये ने विद्यार्थियों और साधकों की समकालीन दार्शनिक तथा व्यावहारिक शंकाओं का समाधान किया। सत्र के आरंभ में एक भौतिकविज्ञानी बौद्ध के प्रश्न पर उन्होंने स्पष्ट किया कि गुरु का आशीर्वाद महत्त्वपूर्ण है, किंतु आधुनिक युग में प्रज्ञा और तार्किक संवाद के माध्यम से विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों के संशयों को दूर कर उन्हें चित्त के वास्तविक सुख की ओर उन्मुख करना कहीं अधिक आवश्यक है। तत्पश्चात, अल्पबुद्धिलब्धि (कम आईक्यू) वाले व्यक्तियों में प्रज्ञा की संभावना पर चान संप्रदाय के प्रसिद्ध कोआन (श्वान में बुद्ध-स्वभाव) का संदर्भ देते हुए उन्होंने तात्कालिक व दीर्घकालिक मोक्ष की दृष्टि से समाधान प्रस्तुत किया; साथ ही बौद्ध सूत्रों के प्रमाण से बताया कि प्रत्येकबुद्ध अ-बुद्ध काल में भी अपने पूर्वजन्मों के सौ कल्पों की कुशल साधना और कल्याणमित्रों के प्रति संचित श्रद्धा के बल पर ही स्वाभाविक निर्वाण प्राप्त करते हैं। पाश्चात्य जगत में बौद्ध धर्म को केवल एक बौद्धिक या दार्शनिक विषय के रूप में देखे जाने और उसमें धार्मिक श्रद्धा के अभाव पर विचार करते हुए खेनपो जी ने बौद्ध परंपरा के दो प्रमुख साधक-भेदों का विशद विश्लेषण किया: 'धर्मानुसारी' (तर्क व प्रज्ञा प्रधान, तीक्ष्णेन्द्रिय) और 'श्रद्धानुसारी' (श्रद्धा प्रधान, मृद्विन्द्रिय)। उन्होंने प्रतिपादित किया कि केवल बौद्धिक तर्क से आध्यात्मिक अनुभूति, अभिषेक और आशीर्वाद का लाभ नहीं मिल पाता, जबकि तर्कहीन श्रद्धा मनुष्य को भ्रम में डाल सकती है; अतः पूर्वी आस्था की भक्ति-भावना और पश्चिमी मस्तिष्क की तर्कशीलता का समन्वय ही साधना का सर्वोत्तम मार्ग है। इस अवसर पर जिज्ञासु साधकों के विशेष आग्रह पर खेनपो जी ने करुणापूर्वक त्रिशरण व्रत भी प्रदान किया। अंतिम प्रश्न के उत्तर में कलियुग में धर्म के ह्रास और युवाओं पर बढ़ते दबाव का विश्लेषण करते हुए खेनपो जी ने महान तिब्बती दार्शनिक जामगोन मिफम रिनपोछे का प्रसिद्ध वचन उद्धृत किया—"यदि पूरी पृथ्वी के लोग भी पाप में लिप्त हो जाएँ, तब भी साधक को स्वयं सन्मार्ग पर अडिग रहना चाहिए।" उन्होंने कहा कि बाह्य भौतिक संपदा कभी भी जन्म, जरा, व्याधि और मरण के दुःखों का समाधान नहीं कर सकती। केवल आंतरिक परिष्कार और चित्त के निरंतर निरीक्षण द्वारा ही मनुष्य अपने जीवन और भाग्य का स्वामी बन सकता है। 🗓️ : 2016719 🤖 AI सामग्री सूचना AI हिन्दी अनुवाद एवं लिप-सिंक AI द्वारा निर्मित हैं। व्याख्यान की विषयवस्तु एवं फ़िल्मांकन स्थल पूर्णतः प्रामाणिक हैं। AI 🏷️ Tags 🔔 सब्सक्राइब करें / 👍 लाइक और शेयर करें / 💬 अपने सवाल कमेंट करें /

Khenpo Sodargye
प्रशिक्षक
स्तर
आसान
CMS स्तर कोड: beginner
विस्तार
14 पाठ · 0 घंटे 18 मि
प्रकाशित
2 जुल॰ 2026
रेटिंग
4.8 / 5 (5 में से)